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Deepak Kumar Patel
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आप भी बचपन में कभी, अपने पापा के कंधों पर बैठे होंगे या उनके साथ, उनकी उंगली पकड़ कर चले होंगे।
आज मैं आपको अपने पापा के बारे में बताने जा रहा हूँ। मेरा नाम दीपक है और मेरे पापा का नाम श्याम दुलार है। हम बनारस में, गंगा किनारे, एक छोटे से गाँव में रहते हैं। मेरे पापा मुझसे बहुत प्यार करते हैं।
हम चार भाई हैं और एक बहन हैं। एक भाई मुझसे बड़ा है और दो छोटे हैं। पापा को जानवरों से बड़ा लगाव है और उनका बड़ा ख्याल भी करते हैं। पापा उनको अपने परिवार का एक हिस्सा मानते हैं। पापा मजदूरी करते हैं।
लगभग 20 सालों से, और वो एक मजदूर ही बनकर रह गये। ऐसा नहीं कि उनको मकान जोड़ना आता नहीं, बल्कि वो कहते हैं कि इंसान का जितने से काम चल जाए, उतने में ही खुश रहना चाहिए क्योंकि इंसान जितना भी पैसा कमा लेगा। उसको कम ही लगेगा और ज्यादा पैसे कमाने के चक्कर में, ना चैन से सोएगा और ना ही चैन से खाएगा।
आपको जानकर यकीन नहीं होगा कि पापा अकेले ही इतनी महंगाई में भी बिना किसी खेती बारी के कई सारे जानवरों को पाल रखे हैं। जिनमें से दो गाय, तीन भैंस और लगभग सात आठ बकरियाँ है और एक कुत्ता भी है। हमारी थोड़ी सी जमीन कुछ दूरी पर है, जोकि पापा का ननिहाल है। वहाँ एक टूटा फूटा मकान और खंडहर जैसा गिरा पुराना घर है। ( वैसे खंडहर तो सिर्फ मुझे लगता है बाकी अपना घर तो अपना होता है ) वहाँ गाय भैंसों के लिए सूखा भूसा रखा जाता है।
चाहे ठंडी हो, चाहे गर्मी हो, चाहे बरसात हो वह कोई भी मौसम हो। पापा रोज साइकिल से वहाँ से, भूसा लेकर आते हैं। आपको बता दूँ वह लगभग रोज 5 किलोमीटर साइकिल चलाते हैं कभी-कभी तो गिरते हुए भी बचे हैं, पर फिर भी वो नहीं मानते हैं। फिर अपना नहा धोकर काम पर चले जाते हैं।
दिन भर काम करते हैं और जब शाम को घर आते हैं और अपनी साइकिल की घंटी बजाते हैं तो घंटी की आवाज से गायों को पता चला जाता है कि पापा आ गए और वे जोर-जोर से चिल्लाने लगती हैं।
पापा गाय के बछड़े को छोड़ते हैं और फिर गायों का दूध निकालते हैं। वह ऐसा सुबह भी करके ही काम पर जाते हैं। फिर शाम को खाना खाते हैं और थोड़ा टीवी में समाचार देखते हैं फिर सो जाते हैं। अगले दिन, पूरा वैसे ही चलता है। यह सब देख कर मैं उनको कहता हूँ कि पापा गाय-भैंसों को बेच दीजिए। इसी में मम्मी भी दिन भर लगी रहती हैं। चाहे सुबह 5:00 बजे उनको भूसा डालना हो, चाहे गोबर साफ करना हो, पूरा दिन! उनका भी इन्हीं सब कामों में बीत जाता है।
मैं उनको यह भी बताता हूँ कि इतनी महंगाई है और आगे भी बढ़ेगी। तब आप गायों के लिए चारे की व्यवस्था कैसे करेंगे? तो भी वो कुछ नहीं कहते बस चुपचाप मेरी बातों को सुन लेते हैं। कभी-कभी तो इन्हीं सब बातों को लेकर मैं उन पर गुस्सा भी करता हूँ पर फिर भी वो मुझसे कुछ नहीं कहते।
शायद यह उनका मेरे लिए प्यार ही है क्योंकि मैं जब अपने आस-पास देखता हूँ.. तो कोई भी बच्चे अपने माता-पिता से इस तरह चिल्लाकर बात नहीं करते। अगर करते भी है तो उनकी खैर नहीं पिटाई तो निश्चित ही है और मुफ्त में दो चार गालियाँ भी पड़ती है। पर मेरे साथ ऐसा नहीं है। पापा सोचते हैं कि हमें हमेशा दूध पीने को मिलता रहे। (वो ये भी सोचते हैं कि गायों को खरीदने के बाद उनका मालिक उनके साथ आगे कैसा व्यवहार करेंगा। ) इसीलिए वो गायों को नहीं बेचते।
बचपन में, जब मैं छोटा था तो पापा साबुन का काम करते थे। वो साबुन बनाने में सबसे तेज थे। वो देर से काम पर पहुँचते थे और सबसे पहले काम निपटाकर घर वापस आ जाते थे। एक दिन उनके मालिक का निधन हो गया और उनका काम बंद हो गया। क्योंकि उनके मालिक का कोई बेटा नहीं था 2 बेटियाँ थी और वह भी छोटी थी। पापा बताते हैं कि उनके पिता, यानी मेरे दादाजी बहुत बड़े शराबी और जुआरी भी थे। नशे में उन्होंने अपने सारे खेत ही बेच दिए और यहाँ तक कि आज हम जहाँ रहते हैं उन्होंने वह भी बेच दिया था। वो तो जैसे-तैसे मेरी दादी ने मेहनत मजदूरी करके घर को छुड़ाया।
पापा लगभग 12-13 साल से ही दादी के साथ काम करते थे। जिसकी वजह से उनकी पढ़ाई भी नहीं हो पाई। वो केवल पांचवी कक्षा तक ही पढ़े।
पापा के एक बड़े भाई थे जो कि बिल्कुल दादा की तरह ही थे शराबी जुआरी टाइप का। उनको किसी काम से कुछ लेना नहीं था बस दिन भर जुआ खेलना और घूमना था। पापा दादी के साथ सुबह निकल जाते, और दिन भर सर पर मिट्टी ढोते थे। उस समय पूरा दिन काम करने पर, 1 दिन की मजदूरी 20 से 25 पैसे मिलते थे। मेरे पापा किसी भी तरीके का कोई भी नशा नहीं करते। यहाँ तक कि वें शाकाहारी है। वो हमें भी कहते हैं कि नशे से दूर रहना चाहिए। वो कहते हैं कि नशे में पूरा खेत चला गया।
बचपन में, जब हम छोटे थे तब मैं और मेरा भाई आपस में बहुत झगड़ा करते थे। एक दिन ऐसे ही किसी बात पर हम दोनों भाई आपस में लड़ रहे थे और भैया ने मुझे मार दिया, मैं रोने लगा पर शायद! गलती मेरी ही थी। पापा आए.. और दोनों को एकाक पटाखा रख दिया। और फिर क्या मैं तो गुस्से में खाना ही नहीं खाया। मम्मी ने, न जाने कितनी बार मुझे खाना खाने के लिए कहा पर मैं नहीं माना। पापा भी कई बार मुझसे बोले कि खा लो पर फिर भी मैं नहीं माना। उस रात में वैसे ही बिना खाए सो गया। सुबह जब उठा तो मम्मी कह रही थी कि तुम रात को खाना नहीं खाए न, तो तुम्हारे पापा भी बिना खाए ही सो गए।
तब मैंने सोचा कि मेरी वजह से पापा दिन भर काम करने के बाद घर आये और बिना खाए ही सो गए। यह मेरे लिए उनका प्यार नहीं तो और क्या था।
पापा, बचपन में हमें अपने कंधों पर घूमाते हैं और बड़े होने पर.. हम उनको ही भूल जाते हैं..।।
- दीपक कुमार पटेल
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